18/09/2021
#मतला
जब तक दरे शब्बीर पा सजदा नही होगा।
नाज़िल कोई रहमत का फ़रिश्ता नही होगा।।
सरवर के अज़ाखाने से घर हैं मेरा आबाद।
मर जाऊँगा गर ताज़िया खाना नही होगा।।
ग़ाज़ी के क़दम चूम के कहता हैं ये दरिया।
इस लमहे से बहतर कोई लम्हा नही होगा।।
ये मजलिस ए सरवर हैं तिजारत नही कोई।
तुम ख़र्च करो जितना भी घाटा नही होगा।।
ये बात हक़ीक़त हैं हक़ीक़त ही रहेगी।
जो शह का न होगा वो किसी का नही होगा।
हैं चौदह चरागों की ज़िया जिसके मक़ा में।
एक लम्हे को उस घर मे अंधेरा नही होगा।।
सरवर ने जड़े काट दी बातिल के शजर की।
अब शाख पा बैयत का परिन्दा नही होगा।।
हम शह के अज़ादारो का जलवा ही अलग है।
दुनिया मे कोई एक भी हम सा नही होगा।।
आशूर को जो नज़्र दे फ़ाका शिकनी की।
फिर साल भर उसके यहा फ़ाक़ा नही होगा।।
गर दामने शब्बीर को छोड़ा जो किसी ने।
महशर में कोई बख़शने वाला नही होगा।
ग़ासिब जो फ़िदक़ के हैं कोई उनसे ये कह दे।
बे दीन कोई दी का ख़लीफ़ा नही होगा।।
हैं ख़ु में अगर पंजतने पाक की उल्फ़त।
दोज़ख़ का उसे ख़ौफ़ ज़रा सा नही होगा।।
पैग़ाम हमे देता हैं ये मक़सदे शब्बीर।
आतंक जो फैलाये वो शिया नही होगा।।
जिसने मेरे मौला का कसीदा न पढ़ा हो।
क़ुरआन में ऐसा कोई सूरा नही होगा।।
#मक़ता
क़ासिम की मोहब्बत हैं #रिज़ा गर तेरे दिल में।
फिर मौत का भी ज़ायका कड़वा नही होगा।।