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जा रहा है क़ैद जंजीरो में मीर ए करवा।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
एक हुजूम ए आम हैं और बे रिदा सब बिबिया।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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जिस तरह भी हो मगर हिम्मत जुटाना है उसे।
रास्ते की हर मुसीबत ख़ुद उठाना है उसे।
उसके आँसू पोछने वाला भी अब कोई कहाँ।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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मौत की दस्तक़ से आख़िर ये भी सूरत हो गई।
रोते रोते रात दिन ख़्वाहर भी रुकसत हो गई।
सर पटख़्ति हैं दर ए ज़िन्दान पर तन्हाईयां।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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लोग उस से कर रहे है ये तक़ाज़ा बार बार।
क्या हुआ अब्बास जैसा शाह का वो जा निसार।
फूल को ज़ख़्मी किये जाती हैं काटो की ज़बा।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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भाइयो का ग़म बहन की फ़िक़्र फुफियो का ख़्याल।
शाह की फुरक़त का ग़म ग़ाज़ी की फुरक़त का मलाल।
हाय एक सीने में है पेवस्त कितनी बर्छिया।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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चश्मा ए इंसानी को हैरत है उसी के सामने।
सोचिये तो क्या क़यामत है उसी के सामने।
उसकी ख़्वाहर के गले मे बध रही हैं रीसमा।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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ज़ुल्मतों के नक़्श उसके जिस्म पर पाये गये।
इतने पत्थर रास्ते मे उस पे बरसायेगे।
टूट कर रोया है उसकी बेकसी पर आसमा।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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कारवाने फ़क्र ए अय्यूबी के ज़िम्मेदार को।
ताज़ियाने लग रहे है आबिद ए बीमार को।
फिर भी चलता जा रहा है बेड़ियों में ना तवा।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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कहने को एक भीड़ हो लेकिन कोई अपना ना हो।
क्या करे वो जिसका कोई पूछने वाला ना हो।
एक तरफ बीमार क़ैदी एक तरफ सारा जहाँ।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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मक़तल ए शब्बीर से दरबार के हंगाम तक।
वादी ए करबोला से हो के "अज़हर" शाम तक।
हर क़दम उसके कलेजे में लगी है एक सिना।।
सख़्त हैं सरवर से कितना इम्तिहा सज्जाद का।।
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